नरेंद्र मोदी आज जो कुछ भी हैं, उसका आधा श्रेय इस मौलवी को जाता है

आखिर क्या वजह है कि नरेंद्र मोदी भारत के सबसे बड़े नेता बन गए हैं?
वो कौन सी वजह थी, जिसके चलते नरेंद्र मोदी हिंदुओं के ब्रैंड बन गए?
वो कौन सी घटना थी, जिसने मोदी को भाजपा के नेताओं में भी सबसे आगे कर दिया?

उस घटना में एक मौलवी थे. वो जिस संप्रदाय से जुड़े हैं, उसकी कहानी भी अद्भुत है.

2002 की घटना नरेंद्र मोदी के करियर का सबसे बड़ा दाग थी. जहां वो जाते, सवाल उनका पीछा करते. अमेरिका ने उनको वीजा देने से इनकार कर दिया था. ऐसा लग रहा था कि नरेंद्र मोदी का राजनीतिक करियर कभी उठ नहीं पाएगा.

लाख सवाल उठे, पर नरेंद्र मोदी ने कभी भी गुजरात दंगों के लिए खुद को कुसूरवार नहीं माना. ना ही उसके लिए कभी माफी मांगी.

पर इसके साथ ही जनता में इनकी इमेज एक कड़े नेता की बन गई. जो विरोधों के बावजूद झुकता नहीं है. यहां तक तो ठीक था. पर नरेंद्र मोदी भाजपा में ही बड़े नेता नहीं बन पा रहे थे. विकास-पुरुष की इमेज जरूर बनी टाटा नैनो प्रकरण के बाद, लेकिन राजनीति में वो अभी भी अछूत माने जाते थे. जनता दूर से ललचाई देखती थी, पर नरेंद्र मोदी की राजनीति उनको समझ नहीं आती थी.

भाजपा के नेता धीरे-धीरे अपनी हार्डलाइन छोड़कर मीठी बातें करने लगे थे. लालकृष्ण आडवाणी तो अपनी सारी जड़ें भूलकर पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिन्ना तक की बड़ाई कर चुके थे.

तभी 2011 में एक घटना हुई जिसने नरेंद्र मोदी की राजनीति बदल दी.

दंगों के बाद गुजरात में हर साल सद्भावना शो होता था. इसमें हिंदू-मुस्लिम सद्भाव पर बहुत ध्यान दिया जाता था. इस बार इसको दस साल हो गए थे. नरेंद्र मोदी भी पहुंचे थे यहां. अहमदाबाद से थोड़ी दूर के पिराना गांव की एक दरगाह के मौलवी सैयद इमाम शाही सईद ने मंच पर मोदी को इस्लामी टोपी ऑफर की. सद्भावना में पहुंचे मोदी के लिए ये बड़ा कठिन मौका था. इनकार कैसे कर सकते थे.

पर मोदी ने इनकार कर दिया.

मोदी ने कहा कि मैं टोपी नहीं पहन सकता. हालांकि शॉल ओढ़ने के लिए राजी हो गए. इसके बाद मोदी की हर जगह खूब आलोचना हुई. कहा गया कि मोदी का खेल समाप्त हो गया और उनकी सारी बात खुल के सामने आ गई.

पर जनता में इसका अलग प्रभाव गया. लोग सही समझे या गलत, पर मोदी की इमेज एक दृढ़ नेता की बन गई. इस घटना ने देश के सामने एक ऐसा नेता रखा था, जो अपनी बात पर टिके रहने के लिए किसी दबाव में नहीं आ रहा था. उस वक्त देश मनमोहन सिंह की कमजोर सरकार से त्रस्त हो गया था. मोदी का ये रूप लोगों को भा गया.

ऐसे मौके पर मोदी की मजबूत इमेज ने एक झटके में उनको भाजपा के कमजोर पड़ रहे नेताओं से बहुत आगे कर दिया.

लेकिन ये मौलवी सैयद इमाम शाही सईद जिस पिराना से आते हैं, वहां की कहानी अद्भुत है. ये हिंदू-मुस्लिम एकता की कहानी है. उसके टूटने की कहानी है.

1449 में सिंध से चलकर सैयद इमामुद्दीन अब्दुर्रहीम पिराना पहुंचे. यहां पर उन्होंने प्रवचन शुरू किया. उनका नाम इमामशाह बाबा हो गया. उनका चलाया हुआ पंथ सतपंथ धर्म कहा गया. यानी सच्चाई का धर्म. उनकी बातों से लोग इतना प्रभावित थे कि वहां मुसलमानों के साथ-साथ पटेल, कोली और ब्राह्मण सभी उनके पास आने लगे.

दरगाह

1513 में इमामशाह ने समाधि ली. और उस वक्त उन्होंने सनाभाई पटेल को धार्मिक काम करने के लिए नियुक्त कर दिया. उसके बाद से इस दरगाह पर पटेल ही मेन होते हैं. उनको काका कहा जाता है. वो आजीवन कुंवारे रहते हैं. इंडिया टुडे ने 1987 में इस पंथ के 22वें हेड कर्सन काका से बात की थी. उनका कहना था कि ईश्वर को कई रास्तों से पाया जा सकता है, इसके लिए किसी को धर्म बदलने की जरूरत नहीं है. उन्होंने ये भी कहा कि इमामशाह ने हिंदुओं के लिए मीट खाना छोड़ दिया था. और मुस्लिमों को भी कहा था कि मीट खाकर वहां ना आएं.

इंडिया टुडे ने लिखा था कि ये दरगाह वैसी ही है, जैसी एक सूफी संत की होती है. गुंबद हैं, जिनमें सोने की परत लगाई गई है. वहीं पर बाबा के अनुयायी शेख अब्दुल रहीम मिर्जा बेग की भी दरगाह है. यहां पर रमजान महीने के 25वें दिन मेला लगता है. जिसमें हर धर्म के लोग आते हैं. दरगाह पर लोग पीरशाह-पीरशाह चिल्लाते हैं. मुस्लिम अखंड ज्योति जलाते हैं. माना जाता है कि ये ज्योति बाबा के मरने के बाद कभी बुझी नहीं है. हालांकि ये हिंदू परंपरा है. इस पंथ को मानने वाले साधु भगवा कपड़े पहनते हैं.

पर टीना पुरोहित की किताब द आगा खान केस में लिखा गया है कि 2002 के दंगों के बाद यहां पर भी स्थिति बदल गई. पहले यहां पर गुजराती, हिंदुस्तानी, सिंधी हर बोली के गीत गाए जाते थे. लेकिन 2008 में पिराना में हिंदू देवताओं के गीत ज्यादा गाए जाने लगे और ये एक हिंदू मंदिर में होने लगा. आगा खान केस खोजा मुस्लिमों से जुड़ा है. ये मुस्लिम भी सतपंथ से ताल्लुक रखते थे.

दरगाह पर मेला लगा हुआ है

17 मार्च 2003 को इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा था कि हिंदू अब दरगाह के पास से मुहर्रम का ताजिया नहीं ले जाने देते. जे जे रॉय बर्मन की किताब गुजरात अननोन के मुताबिक बाबरी मस्जिद गिरने के बाद यहां के किचन में मुसलमानों का घुसना बंद कर दिया गया. इसी किताब के मुताबिक बाबरी गिरने के बाद कर्सन काका के ही साथ मिलकर विश्व हिंदू परिषद ने 1993 में यहां साधु सम्मेलन कराने की कोशिश की थी. इस दरगाह का नाम बदलकर प्रेरणा पीठ कर दिया गया. 1995 में सतपंथ को एक वैदिक संप्रदाय घोषित कर दिया गया. कहा जाने लगा कि इमामशाह एक मुस्लिम नहीं थे, बल्कि एक ब्राह्मण थे. 1999 में यहां पर एक विशाल साधु सम्मेलन हुआ भी. एक भी मुसलमान को नहीं बुलाया गया यहां.

नीलांजन मुखोपाध्याय ने अपनी किताब नरेंद्र मोदी: द मैन, द टाइम्स में लिखा है कि दरगाह के मेन द्वार को हिंदू तरीके से कर दिया गया. मुस्लिम स्टाइल वाला द्वार बंद कर दिया गया है. इसमें उन्होंने सैयद इमाम शाही सईद का भी जिक्र किया है. इनके मुताबिक सैयद को सतपंथ की कोर कमिटी से निकाल दिया गया था. इसी वजह से अब वो सतपंथी की तरह नहीं बल्कि एक मौलवी की तरह बोलते हैं. नरेंद्र मोदी ने जब उनकी दी हुई टोपी पहनने से इनकार कर दिया तो उन्होंने कहा था कि मोदी के टोपी स्वीकार ना करने से मेरा नहीं, बल्कि इस्लाम का अपमान हुआ है.

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