देश में अगर कोई राम मंदिर बनवा सकता है तो वो है चेतन भगत

ये आर्टिकल डेली ओ के लिए अभिषेक सिखवाल ने लिखा है. वेबसाइट की इजाज़त से हम इसे ट्रांसलेट कर आपको पढ़वा रहे हैं.


अयोध्या में राम जन्म भूमि पर राम मंदिर बने न बने, इस पर देश में खूब बहस चल रही है. तरह-तरह के तर्क रखे जा रहे हैं. इसी सब गहमा गहमी के बीच एक रविवार की उदास दोपहर को मुझे पता चला कि चेतन भगत ने इस मुद्दे पर भी अपनी राय रख दी है.  एक अंग्रेज़ी अखबार में, एक ‘विचारोत्तेजक’ लेख लिखकर. यानी उन्होंने फिर एक बेवकूफी की है. मेरे लिए ये एक बढ़िया खबर थी.

मैं और मेरी ‘इंटेलेक्चुअल’ टोली इसी के इंतज़ार में रहते हैं. और चेतन कभी ज़्यादा इंतज़ार भी नहीं कराते. उनका मूड होता है तो वे मुंह उठाकर एक ‘फेमिनिस्ट’ नॉवेल लिख देते है. फिर जब फिक्शन से उनका दिल भर जाता है, तो वो पेचीदा मसलों पर आर्टिकल लिख-लिख कर भारत को एक ‘ऑसम’ देश बनाने के लिए अपने सुझाव देते रहते हैं. चेतन के ‘ऑसम’ भारत में सब कुछ ‘ऑसम’ होगा – ‘ऑसम गवर्नेंस’, ‘ऑसम समाज’, और ‘ऑसम संसाधन.’

चेतन भगत ने अपने ऑसम विचारों को एक किताब की शक्ल भी दी है

मैं पड़े-पड़े जो सोच रहा था वो छोड़कर उठा और अपनी टोली को खबर कर दी कि आज की मीटिंग के लिए ऐसे सारे लोग जुटें जो खुद को ‘बुद्धिजीवी’ समझते हों और देश के बहुसंख्यक धर्म के साथ-साथ भारत से नफरत करते हों. मीटिंग में आने वालों के लिए पासवर्ड रखा ‘महाराजा मैक’. लोकेशन – तृप्ति बार, जहां हम अक्सर मिला करते हैं. आज हम चेतन की ताज़ा ऑसमनेस पर बात करने वाले थे.

मीटिंग के लिए आने वाले सारे लोग एक से एक महान विभूतियां थे. एक स्ट्रीट आर्टिस्ट था हरीश नाम का, जिसका ताज़ा शगल कलकत्ता के कुत्तों को पेंटिंग सिखाना था. देविका एक बुटीक चलाती थी, जिसमें वो दूसरे बुटीक से लाकर सामान बेचती थी. फिर एक निकोलस था – एक ‘एंग्लो इंडियन फेमिनिस्ट.’ इनकी ही तरह के और भी थे, जिनका नाम अब याद नहीं. उनका कंबाइन इंट्रो कुछ इस तरह दिया जा सकता है कि ये वो लोग थे जिन्होंने देश में फिलहाल ‘यंग’, ‘अर्बन’, ‘मॉडर्न’, रैश्नल और ‘इंटेलेक्चुअल’ शब्दों को खुद के लिए आरक्षित कर लिया है. हम सबमें एक ही बात कॉमन है. चेतन भगत से हम सबको बराबर की नफरत है. और यही हमें बांधे रखती है.

चेतन भगत – हमारी टोली को जोड़ने वाला धागा

तय वक्त पर लोग जुटे. सबके सेटल हो जाने पर मैं मीटिंग का ऑफिशियल एजेंडा सेट करने के लिए खड़ा हुआ और एक ओपनिंग रिमार्क दियाः

‘चेतन भगत ने हद कर दी है. इस बार जो आर्टिकल लिखा है, उसने उनके पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. अयोध्या में राम मंदिर बनाने की बात करना बचकाना होने के साथ-साथ खतरनाक भी है.’

देविका ने बात आगे बढ़ाईः

‘जिस अखबार में आर्टिकल छपा है, वो कहां कम है? जब-जब मुझे लगा है कि वो और नहीं गिर सकते, उन्होंने मुझे चौंका दिया है. अब तो मैंने उस अखबार के लिए एक नाम भी सोच लिया है – जर्नलिज़म का राखी सावंत’

इसके बाद मंच खुल गया. और जैसा की होता है, जिसके जी में जो आया, वो कहता गया. चाहे चल रही बात से सीधा संबंध हो या न हो.

स्ट्रीट आर्टिस्ट हरीशः

‘भाई मैं बता रहा हूं, चेतन ने मोदी और हिंदुत्व के साथ मांडवली कर ली है. अब वो इंडिया के बारे में खुद के ही दिए ऑसम सुझावों के खिलाफ हो गया है. ऑसम सोसायटी और ऑसम इक्वैलिटी दोनों अब खत्म समझो’

‘यंग’ लड़का:

‘यार ये भी तो हो सकता है कि जो चेतन कर रहा है वही सही हो. मुझे लगता है कि वो वक्त आ गया है जब हम सब को चेतन की तरह बातें करनी शुरू कर देनी चाहिए’

मैंने ‘यंग’ की बात को आगे बढ़ायाः

‘सही कहा भाई. हो सकता है हम ही गलत जा रहे हों. दुनिया भर में यही तो चल रहा है. सब तरफ नेशनलिज़म का बोलबाला है. किसी को अपनी गलती माननी ही नहीं है, चाहे कोई कितना भी रेसिस्ट, सेक्सिस्ट या कास्टिस्ट हो. आप किसी से कुछ नहीं कह सकते इक्कीसवीं सदी की मिलेनियल जनरेशन शायद ऐसी ही है.’

बाबरी मस्जिद दंगाइयों की एक भीड़ ने ढहा दी थी

निकोलस (ये आउट ऑफ ब्लू बोल पड़ा)

‘लेकिन कल ही तो मैंने पढ़ा कि यूनेस्को ने इंडिया को सबसे अच्छा देश घोषित किया है!’

‘रेश्नल’ लड़कीः

‘शट अप! बोलने से पहले देख तो सही क्या बोल रहा है, कहां बोल रहा है. हां, तो मैं कह रही थी कि सब साले बिके हुए हैं. मनु जोसफ को देख लो. एक वक्त बंदे का हमारे साथ उठना-बैठना था. लेकिन अब उसके कॉलम पढ़कर ऐसा लगता है जैसे किसी ने उसका ब्रेनवॉश कर दिया है. कहता है कि पब्लिक में बिना बात का गुस्सा है और यही सबसे बड़ी समस्या है! उसे देश में माइनॉरिटी पर हो रहे अत्याचार, रोज़ सामने आ रहे नए-नए बैन और हमले दिखाई कैसे नहीं दे रहे?’

मैंने बात वापस चेतन पर लाने की कोशिश की:

‘मेन मुद्दा है चेतन भगत. किसी को उससे जाकर पूछना चाहिए कि वो ये सब कर कैसे लेता है. एक तरफ अपनी किताबों में बड़ी-बड़ी बातें करता है. लेकिन अखबार के आर्टिकल्स में एकदम अलग लाइन पकड़ता है. कहता है अयोध्या में शांति से एक राम मंदिर बनना चाहिए. हद है.

‘अर्बन’ लड़काः

‘वो तो ट्रेलर बस था. उसने उस आर्टिकल में आगे और बहुत कुछ मज़ेदार लिखा है. कहता है कि 1992 में हुई हिंसा दोबारा नहीं होनी चाहिए. वो गलत थी. और ठीक बाद में कहता है कि मुसलमानों को भी मंदिर बनाने के लिए आगे आना चाहिए क्योंकि वहां राम का जन्म हुआ था.’

ये मुझे ठीक लगा. मैंने उसी की बात को आगे बढ़ायाः

‘यही उसकी प्रॉब्लम है. वो बेवकूफ माइथोलॉजी और हिस्ट्री को एक कर रहा है. जबकी दोनों अगल अलग है. जैसे हमें पक्का मालूम है कि अशोक हुआ था. क्योंकि उसके छोड़े शिलालेख यहां-वहां मिलते हैं. राम ने ऐसा कुछ अपने पीछे नहीं छोड़ा. कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं होने से वो एक मिथक ज़्यादा लगते हैं.’

‘इंटेलेक्चुअल’ लड़कीः

‘तो वो बेचारा और करेगा भी क्या? क्योंकि उसके हिसाब से तो इतिहासकार दिनभर तारीखें लिखने के अलावा कुछ और करते ही नहीं.’

अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए शिलाएं सालों से तराशी जा रही हैं

‘यंग’ लड़का:

‘इससे ज़्यादा मज़ेदार उसका हॉस्पिटल वाला आर्ग्यूमेंट है. उसके हिसाब से हॉस्पिटल जगह देखकर कहीं भी बनाए जा सकते हैं, कोई ज़रूरत नहीं कि वो अयोध्या में ही बने.’

हरीश:

‘छोड़ो यार. यहां हॉस्पिटल और स्कूल चाहिए किसको? मुझको तो इनकी सोच पर ही तरस आता है. पढ़ाई पर सब्सिडी देने में इन्हें नानी याद आती हैं लेकिन मंदिर बनाने के लिए कोई कमी नहीं करेंगे. नया टैक्स तक लगा देंगे. मेरे हिसाब से चेतन का सबसे बढ़िया आर्ग्यूमेंट आखिर में आता है. भगवान सब जगह है. लेकिन हमें उसे पूजने के लिए जगह चाहिए होती है. राम वहीं पैदा हुए थे, इसका प्रूफ नहीं है. लेकिन इस बात का प्रूफ है कि लोग बरसों से मानते आए हैं कि राम वहां पैदा हुए थे. खुदाई में भी मंदिर के निशान निकले थे. पहले एक मिथक को फैक्ट की तरह पेश करो और फिर उसके आधार पर अपनी मांग मनवा लो. इन्हें डर है कि सुप्रीम कोर्ट से फैसला इनके खिलाफ भी आ सकता है. फिर इनके प्लान धरे के धरे रह जाएंगे.

इतने में ‘रैश्नल’ लड़की ने टोक दियाः

अच्छा एक बात बताओ. हम इतने समझदार लोग हैं, हमें इस सब को रोकने के लिए क्या करना चाहिए?

इसका जवाब ‘प्रैक्टिकल’ लड़के ने दियाः

मुझे लगता है कि चेतन को बोलने देना चाहिए. जितना ज़्यादा बोलेगा, उतना लोगों को के उसके बारे में मुगालते दूर होते जाएंगे. कुछ दिनों में पब्लिक समझ जाएगी कि हम इलीट लोगों में लाख प्रॉब्लम हों, लेकिन हम आपको कभी आपकी गर्लफ्रेंड से मिलने से नहीं रोकते. कभी आपके खाने पीने को लेकर सवाल नहीं उठाते. हमारी अपनी हिपोक्रिसी है, ढोंग है. लेकिन ‘हम मंदिर वहीं बनाएंगे’ ब्रिगेड से हर लिहाज़ से बेहतर हैं.

इसके बाद मुझे लगा कि अब मीटिंग को एक क्लोज़िंग रिमार्क के साथ खत्म कर देना चाहिए. वर्ना हम रात-भर वही-वही बातें दोहराते रहते. हमारी सोसायटी के लोग बोलने का मौका मिलने पर बोलते ही रहना चाहते हैं. चाहें बात में दम हो न हो. वैसे  मुझे इस सब में मज़ा आता है. इसलिए चेतन भगत से प्यार हो गया है. मैं इंतज़ार कर रहा हूं कि वे कब दोबारा अपने मुख से कुछ ज्ञान की बातें कहें. मुझे बेसब्री से इंतज़ार है उस दिन का जब हम दोबारा एक मीटिंग बुलाएंगे जिसमें हम चेतन भगत को जी भर के कोसेंगे ताकि खुद की नज़र में सही साबित हो सकें.


इस लेख का अनुवाद निखिल ने किया है


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